नई दिल्ली: गौतम अडानी पर लगे 'कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े घोटाले' के आरोपों पर कांग्रेस ने पीएम मोदी से "HAHK - हम अडानी के हैं कौन" श्रृंखला के तहत 11वें दिन सवाल पूछा है। कांग्रेस ने कहा कि ,“ अपने मित्र अडानी के महाघोटाले पर PM मोदी खामोश हैं, अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। इस गंभीर मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी लगातार PM मोदी से सवाल पूछ रही है, उन्हें उनकी जिम्मेदारी याद दिला रही है।
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि ,“क्या आपको इस बात की चिंता नहीं है कि संदेहास्पद प्रमोटरों द्वारा लागत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जाने पर उपभोक्ता और करदाता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है?| अडानी समूह द्वारा किए गए गलत कार्यों की जांच आपके PM का कार्यभार संभालने के बाद निरस्त क्यों हो गई? ...इमर्जिंग मार्केट इन्वेस्टमेंट डीएमसीसी ने अडानी पावर की महान एनर्जेन को ₹7,919 Cr दिए। अडानी इन्फ्रास्ट्रक्चर को गार्डेनिया ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट से ₹5,145 Cr मिले। दोनों ने अडानी समूह को किसी स्पष्ट व्यावसायिक गतिविधि के बड़ा उधार दिया। क्या यह जांच के लायक नहीं है?
"HAHK - हम अडानी के हैं कौन" श्रृंखला के तहत 11वें दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि ,“ हम सभी ने "आर्थिक अपराधियों के लिए सुरक्षित पनाहगाहों को खत्म करने" और "भ्रष्टाचारियों और उनके कार्यों को छिपाने वाले जटिल अंतरराष्ट्रीय विनियमों और बैंकिंग गोपनीयता के मायाजाल को तोड़ने" के आपके आह्वाहन को सुना है। फिर भी विदेशी टैक्स हेवन में स्थित शेल कंपनियों ने आपके मित्र गौतम अडानी के व्यवसाय संचालन में बिना किसी गंभीर परिणाम के केंद्रीय भूमिका निभाई है। उनके भाई विनोद अडानी पर आरोप है कि उन्होंने मॉरीशस में कम से कम 38 शेल इकाइयां स्थापित कीं, जिनमें से कई ने बिना किसी ज्ञात आय के स्रोत और व्यापारिक गतिविधि के अडानी समूह के साथ बड़ा कारोबार किया है।
जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि ,“जैसा कि वादा किया गया था, आज आपके लिए तीन सवालों का अगला सेट प्रस्तुत है, एचएएचके (हम अडानी के हैं कौन) श्रृंखला में ग्यारहवां, जो विदेशी शेल कंपनियों के साथ अडानी समूह के संबंधों पर केन्द्रित है।
(1) राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), भारत की प्रमुख तस्करी - रोधी एजेंसी ने 2014 में पाया अडानी समूह की तीन कंपनियों - महाराष्ट्र ईस्टर्न ग्रिड पावर ट्रांसमिशन, अडानी पावर महाराष्ट्र, और अडानी पावर राजस्थान - ने चीन और साउथ कोरिया से 3,580 करोड़ रुपए की लागत पर आयातित बिजली उपकरणों के लिए दुबई स्थित इलेक्ट्रोजेन इंफ्रा एफजेडई को 9,048 करोड़ रुपए का भुगतान किया था और इसमें से शेष राशि देश से बाहर चली गई। यह पता चला कि इलेक्ट्रोजेन को गौतम अडानी के भाई विनोद द्वारा मॉरीशस स्थित एक इकाई, इलेक्ट्रोजेन इंफ्रा होल्डिंग के माध्यम से नियंत्रित किया जा रहा था। किसी तरह, आपके पीएम बनने के बाद, डीआरआई के निर्णायक अधिकारी ने आरोपों को खारिज कर दिया, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि "मुझे लगता है कि ईआईएफ और एपीआरएल विनोद शांतिलाल अडानी के माध्यम से संबंधित संस्थाएं हैं"।
2014 में डीआरआई द्वारा इस मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा अधिग्रहण के बाद अपील की गई, लेकिन मामला कहीं भी पहुंच नहीं पाया। क्या आप अपने करीबी दोस्तों को बचा रहे हैं, जिन पर अकेले इस मामले में 5,468 करोड़ रुपए की राशि को अन्यत्र हस्तांतरित करने का आरोप है ? क्या आपको इस बात की चिंता नहीं है कि संदेहास्पद प्रमोटरों द्वारा पूंजीगत लागत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जाने पर अंततः उपभोक्ता और करदाता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है?
(2) डीआरआई ने 2004-06 के हीरा घोटाले की भी जाँच की जिसमें गौतम अडानी के छोटे भाई राजेश अडानी और उनके बहनोई समीर वोरा पर हीरे के समक्रमिक (सर्कुलर) व्यापार और ओवर- इनवॉइसिंग का आरोप लगाया गया था ताकि धोखाधड़ी से निर्यात सब्सिडी पर दावा किया जा सके। ये लेन-देन कथित तौर पर दुबई और सिंगापुर जैसे विदेशी टैक्स हेवन के माध्यम से भी किए गए थे।
2013 में, सीमा शुल्क आयुक्त ने राजेश अदानी, समीर वोरा, अडानी एंटरप्राइजेज और अडानी समूह से जुड़ी पांच हीरा व्यापारिक कंपनियों पर जुर्माना लगाया था। हालांकि 2015 में, आपके पीएम बनने के बाद, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण ने आयुक्त के आदेश को रद्द कर दिया और वर्षों से चली आ रही जांच के निष्कर्षों को खारिज कर दिया। यह एक परेशान करने वाले पैटर्न का हिस्सा है जिसमें अडानी समूह द्वारा किए गए गलत कार्यों की विस्तृत जांच आपके पीएम के रूप में कार्यभार संभालने के बाद निरस्त हो जाती है।
(3) विनोद अडानी द्वारा कथित रूप से नियंत्रित शेल कंपनियों ने भी अडानी समूह की कंपनियों में भारी धनराशि निवेश की है। रिकॉर्ड बताते हैं कि यूएई स्थित इमर्जिंग मार्केट इन्वेस्टमेंट डीएमसीसी ने 2021-22 में अडानी पावर की सहायक कंपनी महान एनर्जेन को 7,919 करोड़ रुपए का कर्ज दिया था। उसी वर्ष अडानी इन्फ्रास्ट्रक्चर को मॉरीशस स्थित गार्डेनिया ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट से 5,145 करोड़ रुपए मिले। दोनों संस्थाओं को विनोद अडानी से जुड़ी बताई जाती हैं। दोनों ने अडानी समूह को बिना किसी स्पष्ट ज्ञात व्यावसायिक गतिविधि के बड़ी मात्रा में धन उधार दिया। क्या यह सभी गतिविधियां आपकी जांच एजेंसियों की पलटन के द्वारा जांच के लायक नहीं है?
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने से कहा कि ,“13 फरवरी, 2023 को सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने अडानी-हिंडनबर्ग मामले पर याचिकाओं की सुनवाई करते हुए, अडानी-हिंडनबर्ग प्रकरण के परिणामस्वरूप हुए भंडाफोड़ के आलोक में नियामक तंत्र की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने पर चर्चा की। इसने सरकार को शुक्रवार, 17 फरवरी, 2023 तक इस संबंध में अपना निवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
जयराम रमेश ने से कहा कि ,“प्रस्तुत परिस्थितियों में, जब सत्तारूढ़ व्यवस्था, भारत सरकार और अडानी समूह के बीच घनिष्ठ, परस्पर निकटता के आरोप हैं, ऐसे में भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित कार्यक्षेत्र के साथ एक समिति का गठन शायद ही किसी निष्पक्षता या पारदर्शिता का आश्वासन अथवा संकेत दे सकता है। यह प्रक्रिया, इस प्रकरण में दो प्रमुख भूमिकाएं निभाने वालों - सरकार और अडानी समूह - द्वारा इस मामले में वास्तविक जांच पर पर्दा डालने, उसे टालने, उससे बचने और दफनाने के लिए शुरू की गई एक कवायद है। यह बिल्कुल स्पष्ट होता जा रहा है कि प्रस्तावित समिति अडानी समूह के सत्तारूढ़ शासन के साथ संबंधों की किसी भी वास्तविक जांच को रोकने के लिए इन निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा सुनियोजित ढंग आयोजित नाटकीय प्रपंच का हिस्सा है। इस अवधारणा को इस तथ्य से भी पुष्टि मिलती है कि विदित समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल ने यह सुझाव दिया था कि सर्वोच्च न्यायालय के विचारार्थ, समिति के सदस्यों के नाम सरकार सीलबंद लिफाफे में देगी।
इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, यह अनिवार्य हो जाता है कि जनता के प्रति जवाबदेह निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा अडानी और सत्तारूढ़ शासन के बीच संबंधों की जांच दिन के उजाले में की जाए।
विशेषज्ञों द्वारा विनियामक और वैधानिक तंत्र का मूल्यांकन किसी भी तरह से संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) द्वारा जांच के बराबर नहीं हो सकता है। इस तरह की समिति में चाहे जितने भी सक्षम कर्मचारी हो, लेकिन पिछले दो सप्ताह में सार्वजनिक रूप से उजागर हुए राजनीतिक-कॉर्पोरेट सांठ-गांठ की जेपीसी द्वारा जांच का विकल्प नहीं हो सकती है। इसके पास विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों की जांच करने के लिए प्राधिकार, संसाधन या अधिकार क्षेत्र नहीं है।
जयराम रमेश ने से कहा कि ,“वर्षों से, सार्वजनिक महत्व के मामलों, जैसे कि प्रतिभूतियों और बैंकिंग लेनदेन में अनियमितताओं और वर्ष 2001 के स्टॉक-मार्केट घोटाले की जांच के लिए जेपीसी गठित की गईं थीं। इन समितियों द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रतिवेदन, इस प्रकार की हेराफेरी को प्रेरित करने वाली प्रथाओं को नियंत्रण करने, ऐसे मामलों में दोषसिद्धी और अपेक्षित विधायी संशोधन लाने का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।
यदि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को इस मामले में जवाबदेह ठहराया जाना है, तो जेपीसी के अतिरिक्त कोई भी अन्य समिति इस मामले में सारे दोषों को वैध ठहराने और दोषियों को दोषमुक्त करने की कवायद के अलावा और कुछ नहीं होगी।
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