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अमृतलाल यादव उर्फ गुड्डू महात्मा का BLOG : अमृतनामा - मेरा जीवन संघर्ष

  • by: news desk
  • 25 September, 2019
अमृतलाल यादव उर्फ गुड्डू महात्मा का BLOG : अमृतनामा - मेरा जीवन संघर्ष

उत्तरप्रदेश के एक छोटे से गाँव भगवानपुर खादर के समाजसेवी ग्राम प्रधान की आत्मकथा के कुछ अंश



 



नई दिल्ली: यह मेरे द्वारा लिखित मेरे जीवन संघर्ष की संक्षिप्त कहानी है, यह मेरे बचपन के दिनों की दास्तान है, यह मेरे गरीबी, दुखों भरे दिन, जिंदगी की शुरुआत के भाव-अभाव में बीते हुए दिन, गाँव से सुदूर मुंबई में बीते दिनों, दांपत्य जीवन, बढ़ते सामाजिक प्रभुत्व, राजनीति में बढ़ती ललक, राजनीतिक जीवन में हताशा, महात्मा नाम से प्रसिद्धि और अंततः प्रधान बनने तक का सफर, इस तरह कुल मिलाकर यह मेरे खुद के जीवन की कहानी है। जिसे बिना किसी हेर-फेर-लपेट के बयां किया गया है।





मेरा जन्म किस दिन किस वर्ष हुआ...? यह मुझे बहुत अच्छे से नहीं मालूम। लेकिन यह जरूर मालूम है कि किसी हिंदू त्योहार के दिन हुआ था। जिससे माई-बाबू मुझे ‘बबईया’ नाम से बुलाते थे। हालांकि गाँव में लोग गुड्डू के नाम से जानते हैं और यही नाम अब ज्यादा लोग जानते हैं। मुझे बिल्कुल भी नहीं मालूम कि यह नाम मेरा कब और किसने दिया। बाद में इसके साथ महात्मा किसने जोड़ा जो क्षेत्र में गुड्डू महात्मा के साथ बहुत बड़े हद तक प्रसिद्ध कर दिया।







इसके अलावा अमृत लाल यादव जो मेरा वास्तविक नाम है और वास्तविक क्या मतलब कि जो लिखा पढ़ी में है। वह नाम भी उन दिनों स्कूल के एक मेरे मास्टर साहब जी ने रजिस्टर पर लिख दिया और यही नाम स्कूल और बाद के कागज-पत्रों में अंकित है। इन्हीं स्कूली कागज पत्रों से मुझे भी पता चला कि मेरा जन्म 70 के दशक में भगवानपुर खादर में हुआ. जो कि उत्तर प्रदेश के देवीपाटन मंडल के बलरामपुर जनपद के पचपेड़वा ब्लॉक में खादर क्षेत्र का एक छोटा सा गाँव है। जो अब ग्राम पंचायत भगवानपुर खादर के रूप में मान्यता प्राप्त है।





हालांकि मेरे जन्म के समय बलरामपुर जनपद, गोंडा जनपद में था और मेरे आँखों के सामने ही 1997 में अलग जनपद के रूप में अस्तित्व में आया।मेरा गाँव दो नदियों से घिरा हुआ क्षेत्र, जिसका अस्तित्व लगभग 700 वर्ष पूर्व का है। पहले इस ग्राम पंचायत भगवानपुर खादर में तीन छोटे गाँव शामिल थे भगवानपुर खादर, सादुनगर और लैबुडवा।





लेकिन 2015 ग्राम पंचायत चुनाव से पहले परिसीमन आयोग द्वारा लैबुडवा को स्वतंत्र ग्राम पंचायत का दर्जा देने के उपरांत भगवानपुर खादर बचे हुए दो गाँव भगवानपुर खादर और सादुनगर को मिलाकर एक ग्राम पंचायत के रूप में मान्यता मिली। मौजूदा समय में जब मैं यह आत्मकथा लिख रहा हूँ तो मैं इसी गांव का ग्राम प्रधान  हूँ।





मेरे बाबू राम दुलारे यादव एक किसान और माई सुन्नर देवी एक कुशल गृहणी महिला थी। जो दोनों ही दुर्भाग्यवश अब इस दुनिया में नहीं हैं। बाबू जी दो भाई थे राम दुलारे यादव और रामगुलाम यादव।





मैं अपने पांच भाइयों में बड़े भाई मनगे यादव, चीनी यादव और संकटा प्रसाद यादव से छोटा एवं गुदाई यादव से बड़ा हूँ। इस प्रकार मैं एक भाई से बड़ा और तीन भाइयों से छोटा बीच का था, जिसे मेरे यहां सझला भाई कहां जाता है औरत इसलिए बचपन में काफी प्यार दुलार मिला, हालांकि अभाव भी बहुत थे, और इस तरह बचपन के वह दिन कब बीत गए पता नहीं चला  लेकिन  जब थोड़ा होश संभाला तो पता चला कि जीवन बहुत दुखों में बीतेगी. 



 



थोड़ी बहुत खेती भी थी तो उसमें न तो खाने भर के अनाज पैदा होते थे और न ही घर में किसी का कोई धंधा बिजनेस या नौकरी थी। उस समय जीवन यापन का जो सबसे बड़ा साधन था उसमें भैंस थी, उसी से दूध, दही, घी कुछ खाकर और कुछ बेचकर घर परिवार चलता था।



 



सबसे बड़े भाई मनगे और चीनी भैंस गाय चराते थे और मुझसे बड़े भाई संकटा प्रसाद खेती बाड़ी का काम बहुत मेहनत से किया करते थे। बचपन में गरीबी के कारण मुझे भी दही और फिर दूध बेचना पड़ा। हालांकि मैं थोड़ा होशियार था। बाबूजी पढ़ाना चाहते थे। लेकिन संसाधनों का अभाव था इसलिए बाबूजी किसी अच्छे जगह पढ़ा पाने में असमर्थ थे इसलिए गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में नाम लिखा दी और वहीं से मेरी प्राइमरी शिक्षा दीक्षा हुई, उन दिनों न तो अच्छे कपड़े हुआ करते थे और न ही जीवन जीने के अन्य संसाधन, किसी तरह मैट्रिक के लिए पचपेड़वा में दाखिला लिया। बाद के दिनों में कुछ अभाव और कुछ फेल होने के डर के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वहीं से फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।



 



क्योंकि हाई स्कूल की परीक्षा से पहले ही मेरे कक्षा के मित्र बहुत डरा रहे थे कि फेल हो जाओगे। फिर क्या था मुझे लगा कि इतने अभाव में पढ़ाई नहीं की जा सकती। मजबूरन कोई दूसरा रास्ता तलाश करना पड़ा और वह रास्ता था मुंबई जाकर पैसे कमाने का। वहीं से मैंने यह रास्ता अख्तियार किया और मुंबई जाने का फैसला कर लिया और मेरा ऐसा मानना है कि...'' मैं फिर कभी जीवन में फेल ही नहीं हुआ''



हालांकि मुंबई में भी आसान नहीं था। पहली बार इतने कम उम्र में किसी बीहड़ गाँव से निकलकर एक बडे़ शहर में अपने आप को स्थापित कर पाना आसान नहीं। लेकिन परिश्रम करके वहाँ अपने आप को स्थापित किया। मुझे मेरे घर की सबसे बड़ी समस्या लगी कि पहले मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए और बाद में कुछ और।



 



गरीबी की ऐसी हालत थी कि न तो किसी की शादी होती थी और न ही कोई अन्य उत्सव हो पाता था। मैंने मुंबई में बहुत मेहनत की। मछली से लेकर आम बेचना और फिर समय-समय पर अन्य बिजनेस भी किये। जिससे घर की मौलिक जरूरत जल्दी ही पूरी हो गई। लोग कुछ खुश थे। लेकिन मैं कहाँ खुश था। मैं तो सब बदल देना चाहता था। उन पुरानी तस्वीरों को, उन हालातों को, उन समस्याओं को जो मैंने अपने बचपन के दिनों में झेली थी।



 



मैं किसी भी हालत में आने वाली पीढ़ी को ऐसा नहीं देखना चाहता था। मैं बाबूजी की मदद से हालांकि यहाँ बता देना जरूरी होगा कि बाबूजी की क्या मदद थी? वे बहुत कंजूस थे। एक-एक पैसा इकट्ठा करते रहते थे। मैं जितना पैसे देता था बाबूजी उस पैसे का सदुपयोग ही करते थे। इस तरह एक लंबे परिश्रम के बाद मैंने बहुत जमीन खरीदी। सारी जमीनें बाबूजी के नाम से कर दी। उन दिनों बाबूजी और मेरे कुछ मित्र कहते थे यह जमीने भाइयों में बट जाएंगी और तुम्हारे हाथों कुछ नहीं लगेगा। लेकिन मैंने किसी की एक न सुनी क्योंकि मैं अपनी आने वाली पीढ़ी को बिल्कुल भी उस हालात में नहीं देखना चाहता था।



 



इस बीच मुंबई में एक बड़ी घटना घटी थी। बगल के एक घर में बम किसी गलती से फट गया था और उसमें काफी जान माल माल का नुकसान हुआ था। खैर मेरा बहुत ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था। इस तरह समय बीतता गया। हालात पहले से बहुत बेहतर हो गये थे। काफी जमीन खरीद ली थी। मुंबई में घर भी ले लिया था। बीच में शादी भी गाँव से कुछ ही दूर मल्दा में हुई। लेकिन हालात इतने गए गुजरे थे कि उसकी कोई खास खुशी नहीं थी। लेकिन मेरी पत्नी राधिका का बाद के दिनों में बहुत ही योगदान रहा। इतना कुछ करने के बाद घर की हालात पहले से बहुत ठीक हो गई थी। सभी के शादी ब्याह होने लगे थे।



 



सामाजिक प्रभुत्व भी समय के साथ अच्छा बनता गया और फिर मन कहाँ मानने वाला था।”क्योंकि मैंने तो शुरू ही शुरुआत से की थी। गए गुजरे दिनों से की थी, बुरे हालात से की थी और इसलिए मुझे कोई भी लड़ाई जीतने की भी पूरी आशा हुआ करती थी और हारता भी तो क्या।”



 



इस प्रकार 1995 के चुनाव में पहली बार क्षेत्र पंचायत का चुनाव लड़ा। हालांकि बाबूजी इन सब कार्यों  से सहमत नहीं रहते थे। क्योंकि वह थोड़ा कंजूस थे और उन्हें लगता था कि सिर्फ इससे पैसे की बर्बादी होगी। इन्हीं सब कारणों से घर में भी इतनी संख्या होने के कारण भी केवल 50 वोट ही मिले और चुनाव हार जाना पड़ा। लेकिन अब किसी हालात में मैं मानने वाला नहीं था क्योंकि इतने वोट भी मेरे लिए बहुत मायने रखते थे। उस दौर में जब बाबूजी एक तरफ से मेरे समर्थकों को बुरा भला कहा करते थे।



 



लेकिन मैं बहुत खुश था क्योंकि मैं तो अपने जीवन की शुरुआत ही अभाव से किया था। इसलिए मुझे पूरी आशा थी कि भविष्य में इसे जरूर बढ़ाया जा सकता है। और फिर बाबू जी जी भी मान गए थे। इसके बाद तो फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार चुनाव लड़ता रहा। चुनाव दर चुनाव मेरे मतों में वृद्धि होती रही।



 



मुझे तो उस दोहे पर विश्वास था कि



'‘करत -करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।



रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निसान।’'



 



इस प्रकार अंततः मैंने 2015 में यह भी लड़ाई जीत ही ली। इस समय जब मैं यह आत्मकथा लिख रहा हूँ तो मैं प्रधान ही हूँ। लेकिन इसमें जो सबसे बड़ी कमी रह गई और मैं इसके लिए सबसे ज्यादा दुखी भी हूँ कि मैं बाबूजी के सपनों को बाबूजी के रहते नहीं पूरा कर पाया। क्योंकि आज मेरे बाबूजी होते तो सबसे ज्यादा खुश होते। लेकिन विधाता के अंतिम कानून से कोई नहीं बच सकता और इस खुशी में सबसे ज्यादा बाबू और माई का न होना ही खल रहा है। लेकिन किया भी क्या जा सकता है। एक उम्र बाद तो सभी को जाना ही है।



 



इस प्रकार मेरे जीवन में एक और उपलब्धि जुड़ गई। जिसके लिए मैं बहुत मेहनत किया था और मेरे मार्गदर्शक बबलू भैया, संजय भैया, सहयोगियों जिसमें आनंद, रिंकू, आदर्श विजय बहादुर, श्याम बहादुर, विष्णु, मिठाई, ढुल्लू बाबा, झुगा साहेब, तिलकराम, मोतीलाल, मिट्ठू साहब, सुरेश,  हरिश्चंद्र,  गुरबचन, पिंटू साहब, मिश्रा साहेब आदि लोगों और घर के लोगों जिसमें लाला, जितेंद्र, सुरेश, जगलाल आदि लोगों की मेहनत एवं गाँव के सभी लोगों के सहयोग से ही यह संभव हो पाया।



 



2015 से मैं लगातार अपने ग्राम पंचायत के लोगों की सेवा भी कर रहा हूँ। सभी को राशन मुहैया कराने से लेकर, शौचालय निर्माण, सभी को किसान सम्मान निधि, पात्र लाभार्थियों को पेंशन, नल, सड़क, स्कूल, पुल, पुलिया, अस्पताल, विद्युतीकरण एवं बिजली से लेकर शादी ब्याह एवं अन्य दुख सुख में लोगों के साथ खड़ा रहा हूँ और आगे भी सेवा जारी रखूँगा। चाहे चुनाव हारे या जीते। क्योंकि अब तो जीवन का एकमात्र लक्ष्य ही यही बचा है।



 



इसी तरह जीवन के तमाम पहलू, तमाम सुखों दुखों भाव अभाव में मेरा जीवन निरंतर बीत रहा है। हालांकि मेरा मानना है कि अब हालात पहले की तरह नहीं है। लेकिन अभी मुझे समाज के लिए बहुत कुछ करना है। मैं समाज के लिए बहुत कुछ इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि मेरी शुरुआत ही खाना जुटा पाने से थी।



 



लेकिन मुझे विश्वास है कि भविष्य में समाज के लिए भी कुछ बड़ा करने का जरूर मौका मिलेगा। और इस तरह ‘बबईया से महात्मा तक का’ रहा मेरे जीवन का सफर।



 



 



 



अमृतलाल यादव उर्फ गुड्डू महात्मा, 

ग्राम प्रधान भगवानपुर खादर



 



 


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