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JNU एक बार फिर से सुर्खियों में: फीस वृद्धि और मैस मैनुअल्स को लेकर छात्रों का गुस्सा और प्रतिरोध उतरा सड़कों पर

  • by: news desk
  • 12 November, 2019
JNU एक बार फिर से सुर्खियों में: फीस वृद्धि और मैस मैनुअल्स को लेकर छात्रों का गुस्सा और प्रतिरोध उतरा सड़कों पर

नई दिल्ली: जेएनयू एक बार फिर से सुर्खियों में है।जेएनयू में न सिर्फ तीन सौ प्रतिशत फीस बृद्धि की गयी है बल्कि मैस मैनुअल्स को लेकर भी जेएनयू छात्रसंघ और विद्यार्थियों का गुस्सा और प्रतिरोध सड़कों पर भी दिख रहा है।कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री मोदी तक ने देर से ही सही अर्थशास्त्र में नोबुल पुरस्कार जीतने वाले जेएनयू के पूर्व छात्र अभिजीत बनर्जी को बधाई दी थी। उसी जेएनयू को सत्तातंत्र द्वारा बहुत सुनियोजित तरीके से बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है।




जेएनयू के उप कुलपति प्रो.जगदीश कुमार अपने आकाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।दरअसल संघ भाजपाई दक्षिणपंथी टोली हमेशा से जेएनयू से खौफजदा रही है।इसलिए जेएनयू की लोकतांत्रिक और संवाद की संस्कृति,उसके प्रतिरोध की शक्ति और बौद्धिकता पर ताले लगाने की साजिश की जा रही है।





सत्ता में आने के दिन से ही जेएनयू को लेकर संघी भाजपाई नेताओं और मंत्रियों द्वारा ऊलजलूल बयानबाजी होती रही है।जेएनयू को कभी नक्सलवाद का अड्डा कहा गया तो कभी आतंकवाद की सराय।कभी जेएनयू के विद्यार्थियों को राष्ट्रद्रोही कहा गया कभी मध्यवर्ग के इनकम टैक्स पर पलने वाला बताया गया।जेएनयू के अध्यापकों-विद्यार्थियों ने इस तरह के बयानों की साजिश का पर्दाफाश ही नहीं किया बल्कि बौद्धिकता और संघर्ष की अपनी परंपरा के अनुसार कड़ा प्रतिवाद किया।छात्रसंघ के इस साल के चुनाव में चारों पदों पर वामपंथी दलों की जीत से बौखलाए वीसी ने इसे व्यक्तिगत लिया था।इसीलिए उन्होंने इस चुनाव अवैध तक ठहराने की कोशिश की।




इसमें भी जब कामयाबी नहीं मिली तो अब फीसबृद्धि और नये मैस मैनुअल्स से छात्र -छात्राओं को प्रताड़ित करने की नयी चाल खेली गयी है।जेएनयू में पहली बार किसी वीसी द्वारा कैम्पस में सीआरपीएफ जवानों को तैनात किया गया है।वीसी का कहना है कि यहाँ दंगा फसाद हो सकता है।जबकि जेएनयू का इतिहास गवाह है कि छात्रसंघ के चुनाव बिना बाहरी सुरक्षा और पुलिस फोर्स के संपन्न होते रहे हैं।कैंपस में एबीवीपी की भी अच्छी उपस्थिति है।




एबीवीपी से जुड़े छात्र भी जेएनयू की रवायत और न्यूनतम फीस में बेहतर पढ़ाई ,शोध की गुणवत्ता और विमर्शमूलक माहौल को बनाए रखने के पक्षधर हैं।जेएनयू ऐसा संस्थान है जहाँ उच्च वर्ग और कथित उच्च वर्ण से आने वाले छात्र भी जातिगत या समुदायगत भेदभाव पर करारा प्रहार करते हैं।सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों को समझते बूझते ये छात्र दलित,आदिवासी,स्त्री और पिछड़ों के आरक्षण की वकालत करते हैं।जेएनयू पर यह पहला हमला नहीं है बल्कि 2014 में सत्ता में आए दक्षिणपंथी धड़े द्वारा जेएनयू की धार को कुंद करने की प्रक्रिया की अगली कड़ीमात्र है।जेएनयू पर पहला बड़ा सुनियोजित हमला फरवरी 2016 को हुआ था।इसके बाद राष्ट्रवाद के एजेंडे और डंडे के बल पर पूरे देश में जेएनयू को बदनाम की साजिश रची गयी थी।





इसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं: - 9 फरवरी 2016 को मीडिया के एक हिस्से और सत्तातंत्र की मिली भगत से जेएनयू पर बड़ा हमला हुआ। दरअसल, यह घटना दक्षिणपंथी सत्तातंत्र और उसके प्रचारतंत्र द्वारा बुद्धिजीवियों तथा उच्च शिक्षण संस्थानों पर हो रहे हमलों की ही एक कड़ी है।



जेएनयू भारत में मानविकी और समाजविज्ञान का सबसे प्रतिष्ठित संस्थान है। मौलिक चिंतन और बौद्धिकता के लिए जेएनयू पूरी दुनिया में जाना जाता है। जेएनयू केवल एक संस्था नहीं है बल्कि एक संस्कृति का नाम है। एक ऐसी संस्कृति जिसमें बौद्धिक खुलेपन, विवाद-संवाद, सहमति-असहमति और स्वतंत्र जीवन शैली की पूरी गुंजाइश है।




वस्तुतः यह हमला बदलते परिवेश में शिक्षण संस्कृति, बौद्धिकता, जन- पक्षधरताऔर लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात है। जेएनयू शिक्षा और संघर्ष का अनूठा उदाहरण है। जेएनयू का यही अनूठापन वर्चस्वशाली ताकतों और कट्टरपंथियों की आंखों में खटकता है। जेएनयू पर कोई पहली बार हमला नहीं हुआ। इसके पहले भी कई बार छिट-पुट घटनाएं होती रही हैं।



पिछले कुछ सालों से जुबानी हमले भी हो रहे थे। लेकिन 9 फरवरी 2016 का हमला बहुत सुनियोजित तरीके से किया गया था। दक्षिणपंथी हिन्दूराष्ट्रवादी सत्ता स्थापित होते ही जेएनयू को बदनाम करके खत्म करने की साजिश रची जाने लगी थी। यह हमला उसी साजिश का नतीजा है। जेएनयू के विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने अपने अंदाज में इसका जवाब दिया है।





जेएनयू की एक पूरी सांस्कृतिक विरासत है। इसके निर्माण के पीछे एक विचार था। श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार और उनके शिक्षा मंत्री एन0सी0 छागला जेएनयू को एक ऐसे संस्थान के रूप में देखना चाहते थे, जिसमें वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशील माहौल हो। जवाहरलाल नेहरू के नाम पर जून 1969 में स्थापित इस विश्वविद्यालय के पीछे कहीं न कहीं नेहरू का ही विजन था।




नेहरू के सपनों का विश्वविद्यालय इंदिरा गांधी सरकार बनाना चाहती थी। इसके लिए पूरे देशभर से विभिन्न विचारधाराओं के बुद्धिजीवियों को बुलाया गया। विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन करने वाले बुद्धिजीवियों को भी यहां बुलाकर अवसर उपलब्ध कराया गया इन बु़द्धजीवियों में ज्यादातर वामपंथी विचारधारा से जुड़े हुए लोग थे। इसलिए जेएनयू शुरूआती दौर से ही वामपंथी विचारधारा का गढ़ बन गया।





जेएनयू को जनतांत्रिक शिक्षण संस्कृति के लिए जाना जाता है। यह माहौल वहां के प्रशासन, अध्यापक, कर्मचारी और विद्यार्थियों की आम सहमति से बना है। विश्वविद्यालय की निर्माण प्रक्रिया में विद्यार्थियों की सहभागिता के लिए छात्रसंघ स्थापित हुआ। जेएनयू भारत का पहला संस्थान है, जहां बाकायदा छात्रसंघ का संविधान है।




मजे की बात यह है कि छात्रसंघ और इसका संविधान भी विद्यार्थियों द्वारा ही बनाए गए। प्रकाश करात और रमेश दीक्षित ने छात्रसंघ बनाया। रमेश दीक्षित, सुनीत चोपड़ा और एस0पी0 तिवारी ने मिलकर छात्रसंघ का संविधान लिखा। रमेश दीक्षित एक साक्षात्कार में कहते हैं कि किसी भी छात्रसंघ का चुनाव छात्रों द्वारा निर्वाचित निर्वाचक मण्डल द्वारा ही कराया जाना, 1970 में निश्चित ही एक मौलिक परिकल्पना थी।




जेएनयू के पहले कुलपति जी0 पार्थसारथी , पहले रेक्टर मूनिस रजा और पहले रजिस्ट्रार एन0 वी0 के0 मूर्ति की प्रेरणा से अकादमिक कौंसिल जैसी नीति निर्धारक समितियों में छात्रों की भागीदारी और विभिन्न किस्म की असमानताओं को दूर करने के लिए प्रवेश नीति में अनूठी आरक्षण की व्यवस्था बनी।




1972 में दूसरे छात्रसंघ का चुनाव हुआ। संविधान पर आधारित इस चुनाव में वी0 सी0 कोसी, रमेश दीक्षित, मधु प्रसाद,सुनीत चोपड़ा आदि छात्रों के सुझाव पर इस आरक्षण की व्यवस्था की गई। इस समिति ने रिसर्च किया कि पिछड़ेपन के कितने आधार हो सकते हैं।इसके निष्कर्ष के बिना पर जाति, लिंग, क्षेत्र और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की गई। 1973 में इस आधार पर पहली बार दाखिले हुए। आरक्षण के इस अनूठे और जनतांत्रिक अवसर के लाभ के फलस्वरूप दूरदराज के इलाकों के दलित, आदिवासी, गरीब और पिछड़े समुदाय के तमाम विद्यार्थी जेएनयू में दाखिल हुए। वस्तुतः जेएनयू भारत के सर्वाधिक दलित, वंचित, पिछड़े,स्त्री वर्गों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के सपनों को साकार करने का संस्थान बन गया।





जेएनयू पर इसीलिए हमला हुआ क्योंकि यथास्थितिवादियों को वंचित और पिछड़े समुदाय के बराबरी पर आने से परेशानी होती है। उनके विशेषाधिकार और वर्चस्व को जेएनयू से चुनौती मिलती है।ये हमला जेएनयू की जनतांत्रिक संस्कृति और गैर-बराबरियों को समाप्त करने के प्रयास पर हमला है। जेएनयू की छात्र राजनीति का फलक बहुत व्यापक है। जेएनयू के विद्यार्थी देश और दुनिया की समस्याओं पर बहस करते हैं। यहां का हर विद्यार्थी राजनीतिक चेतना से सम्पन्न है।




दलित,वंचित, पिछड़े, समुदाय और दुर्गम क्षेत्रों से आने वाले प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को यहां के माहौल में अपनी योग्यता को सृजित करने, खुद को साबित करने और राष्ट्र निर्माण में अपनी सहभागिता करने का अवसर मिलता है। राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रभक्ति का मतलब बड़ा तिरंगा फहराना और टैंक रख देना नहीं है। जेएनयू के छात्र-छात्राएं पिछले सालों में निर्भया कांड जैसे सामाजिक मुद्दों से लेकर गरीबी-बेरोजगारी के प्रश्नों पर सड़कों पर जूझते रहे हैं।



जेएनयू लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक-आर्थिक आजादी के प्रश्नों को हमेशा बुलन्द करता रहा है। साम्प्रदायिकता और  फासीवाद का पुरजोर विरोध कैम्पस में होता रहा है। पूरी दुनिया में अमेरिका के बढ़ते सामाज्यवाद और पूंजीवाद की तार्किक और तीखी आलोचना जेएनयू में लगातार बहुत सृजनात्मक ढंग से होती रही है।





जेएनयू में संघर्ष का लंबा इतिहास है। आपातकाल लगाने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यहां के विद्यार्थियों ने जेएनयू में दाखिल नहीं होने दिया। इसी दौरान जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष डी0 पी0 त्रिपाठी को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। साथ ही तमाम दूसरे छात्र भी जेल गए।

डेविड सेलबोर्न ने आपातकाल पर आधारित अपनी किताब ‘एन आई टू इंडिया’ में जेएनयू में छात्रों के आन्दोलन पर करीब पचास पन्ने लिखे हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों की इस लड़ाई में पढ़ाई के साथ-साथ रचनात्मक संघर्ष जारी था।




पोस्टर लिखना और छोटी-छोटी सभाएं करना इस संघर्ष के हिस्सा थे। जेएनयू में कक्षाएं कभी बंद नहीं हुईं। अध्यापकों के न रहने पर वरिष्ठ छात्र जूनियर कक्षाएं पढ़ाते थे। जनता पार्टी की सरकार द्वारा आपातकाल की जॉच के लिए बने शाह कमीशन की रिपोर्ट में भी जेएनयू के संघर्ष की दास्तान दर्ज है।





जेएनयू की शिक्षा-संस्कृति और आन्दोलनधर्मिता से वर्तमान दक्षिणपंथी सत्ता खौफ खाती है। आखों में आखें डालकर जेएनयू के छात्र लुटियंस दिल्ली की राजसत्ता से सवाल पूछते हैं। ये नकारा सत्ता जवाब देने से घबराती है। इसलिए जेएनयू की आवाज को दबाने के लिए 9 फरवरी 2016 को बहुत सुनियोजित तरीके से उस पर जोरदार हमला किया गया।




इस घटनाक्रम के बाद गिरफ्तार किए गए छात्रसंघ पदाधिकारियों पर अदालत में शारीरिक हमला किया गया। इसके साथ जेएनयू की संस्कृति को विकृत करके विद्यार्थियों को देशद्रोही के रूप में इतना दुष्प्रचारित किया गया कि जेएनयू और मुनीरिका के बीच संकरी सड़क चौड़ी खाई में तब्दील हो गई। ऐसे माहौल में जेएनयू के छात्रों-अध्यापकों और पूरी बौद्धिक परंपरा के प्रति नफरत और हिंसा का व्यवहार किया जा रहा था।




देश के  तत्कालीन गृहमंत्री से लेकर मानव संसाधन मंत्री तथा अन्य भाजपाई मंत्री-सांसद और अन्य नेता जेएनयू के खिलाफ लगातार जबानी हमले कर रहे थे। गोलवलकर की विचारधारा के वारिस, जेएनयू और वामपंथी धारा को देशद्रोही घोषित करने के लिए बड़ी चालाकी से देश और हिन्दुत्व को गड्डमड्ड करके पेश कर रहे थे।




इस माहौल में, एक बार फिर जेएनयू ने रचनात्मक तरीके से दक्षिणपंथी हिन्दूवादी सत्ता और राजनीति को जवाब देने का निर्णय किया। चूंकि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और थोथी देशभक्ति के जुमले उछालकर जेएनयू को बदनाम किया जा रहा था, इसलिए जेएनयू में राष्ट्रवाद की अवधारणा पर बहस शुरू हुई।




खुले में होने वाली यह बहस राष्ट्रवाद पर कक्षाओं में तब्दील होती गई। इन कक्षाओं में जेएनयू के प्राध्यापकों के आलावा अनेक रचनाकारों और जन आन्दोलनकारियों ने राष्ट्रवाद पर व्याख्यान दिए। इन व्याख्यानों में राष्ट्रवाद के स्वरूप,इतिहास और समकालीन संदर्भों के साथ उसके खतरे भी बताए-समझाए गए।





राष्ट्रवाद कोई निश्चित भौगोलिक इकाई नहीं है। राष्ट्रवाद काल्पनिक समुदाय भी नहीं है। दरअसल, राष्ट्रवाद एक आपसदारी की भावना है। राष्ट्रवाद आपसी सहमति है। राष्ट्रवाद एक अनुभूति है जो हमें राष्ट्र के विभिन्न समुदायों तथा संस्कृतियों से जोड़ती है।राष्ट्रवाद की कई अवधारणाएं हैं, जो देश-काल की विभिन्न परिस्थितियों में निर्मित हुईं हैं। विश्वयुद्धों के दौरान उपजा राष्ट्रवाद एकल पहचान और संस्कृति पर आधारित था। यूरोपीय राष्ट्रवाद की अवधारणा में एक भीतरी या बाहरी शत्रु की उपस्थिति भी जरूरी रही है। हिंसा और वर्चस्वभावना इसके दूसरे पहलू हैं।




पूंजीवाद के साथ इसका निजी रिश्ता है। इसके बरक्स तीसरी दुनिया के औपनिवेशिक देशों में विदेशी शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रवाद की भावना अंकुरित हुई। भारतीय राष्ट्रवाद स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान विकसित हुआ। इसके मूल में साम्राज्यवाद विरोधी भावना थी। 




राष्ट्रवाद के अपने खतरे भी हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर गांधी, अम्बेडकर, नेहरू और प्रेमचंद इन खतरों को देख-समझ रहे थे। भारतीय राष्ट्रवाद के सामने धार्मिक राष्ट्रवाद के खतरे थे। हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रवाद उसी दरम्यान पनप रहे थे। इसीलिए टैगोर समूचे विश्व में राष्ट्रवाद की आलोचना कर रहे थे तो गांधी, अम्बेडकर और नेहरू धार्मिक राष्ट्रवाद को प्रश्नांकित कर रहे थे।



अम्बेडकर ने राष्ट्रवाद को खारिज करते हुए कहा कि भारतीय समाज व्यवस्था जातियों में विभाजित है। इस विभाजन में असमानता, अन्याय, भेदभाव और छुआछूत की भावना है। ऐसे में, खासकर हिन्दू एक राष्ट्र हो ही नहीं सकते। नेहरू धार्मिक राष्ट्रवाद के प्रति बेहद चौकन्ने थे। यही कारण है कि उन्होंने धार्मिक प्रतीकों और कर्मकांडों से सरकार को मुक्त रखा।





आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव में, विभाजन के दंश के बावजूद नेहरू जी अपने भाषणों में धर्म निरपेक्षता पर बहुत जोर देते थे। नेहरू जनता से संवाद करते थे। जनता से पूछते थे कि वे कैसा भारत बनाना चाहते हैं, धर्म आधारित पाकिस्तान जैसा या एक धर्म-निरपेक्ष भारत; जिसमें सभी धर्म-सम्प्रदाय के लोग आपसी सौहार्द और सम्मान के भाव से रहते हों। राष्ट्र निर्माण की इस भावना से समावेशी राष्ट्रवाद निर्मित हुआ। सार्वजनिक संस्थानों के निर्माण से लेकर आरक्षण की व्यवस्था और मूल अधिकारों, नीति-निर्देशक तत्वों द्वारा एक नए भारत का निर्माण हो रहा था।





समावेशी और सर्वधर्म समभाव पर आधारित राष्ट्र और राष्ट्रवाद वर्चस्वशाली ताकतों की आखों में गड़ रहा था। वस्तुतः यह ताकतें भारत की आजादी और संविधान से विचलित थीं। ये सवर्ण सामंती शक्तियां भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाकर संविधान की जगह मनुस्मृति को लागू करना चाहती थीं।इसी दक्षिणपंथी वर्चस्वशाली विचारों के एक प्रतिनिधि नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी। इन ताकतों की नफरत जितनी पाकिस्तान और मुसलमानों के प्रति थी, उतनी ही समाजवादी और संविधानवादी व्यवस्था के प्रति थी।





दुर्भाग्य से, ये संकीर्ण सवर्ण सामंती शक्तियां समय के साथ-साथ मजबूत होती गईं। नेहरू युग की अपेक्षाओं और इंदिरा गॉधी द्वारा आपातकाल की परिस्थितियों ने इन्हें उभरने का मौका दिया। राममंदिर आन्दोलन ने इन्हें मजबूत बनाकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया।





इसके बाद दक्षिणपंथी स्वर्ण हिन्दूवादी शक्तियां पूरी बेशर्मी से खुलकर धर्म और आस्था की राजनीति करने लगीं। नवउदारवादी पूंजीवाद के स्थापित होने बाद बाबा, बाजार और बेरोजगारी की जुगलबंदी ने धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दिया। इस प्रकार, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भारतीय राष्ट्रवाद के रूप में थोपने की कोशिश की जाने लगी।



अब तो बड़ी निर्लज्जता से भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के संकल्प दोहराए जा रहे हैं। संघ, भाजपा और अन्य हिन्दूवादी संगठनों द्वारा पूरे देश में नफरत और हिंसा का खौफनाक माहौल तैयार किया जा रहा है। जेएनयू पर हुआ हमला इसकी बानगी है।





हालांकि जेएनयू और देशभर के बुद्धिजीवी, साहित्य-संस्कृतिकर्मी,आन्दोलनकारी और दूसरे शिक्षण संस्थानों के नौजवान विद्यार्थी डटकर इन ताकतों का मुकाबला कर रहे हैं। सत्ता में दोबारा आने के बाद ये ताकतें ज्यादा उग्र और हमलावर हुई हैं।हाल ही में जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में वामपंथी दलों की जीत ने सरकारी पिट्ठू बना प्रशासन अधिक कुंठित हो गया है। 




सत्ता के इशारे और एजेंडे पर शिक्षा के निजीकरण की प्रक्रिया के तहत जेएनयू के समूचे माहौल को बदलने की साजिश की जा रही है।सत्ता में बैठी सवर्ण सामंती शक्तियाँ दलित,वंचित,पिछड़े और स्त्री समुदाय को सस्ती और स्तरीय शिक्षा से महरूम करने का  सुनियोजित षडयंत्र कर रही हैं।इसीलिए लगातार जेएनयू छात्र समुदाय को बदनाम करने उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म करने की कोशिश की जा रही है।इसका प्रतिरोध करने की सिर्फ जेएनयू के छात्र समुदाय की ही जिम्मेदारी नहीं है बल्कि सभी लोकतांत्रिक विचार रखने वालों की जिम्मेदारी है।






 BLOG: रविकान्त 



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