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दीपक कुमार त्यागी का BLOG: एनआरसी हिंदू-मुस्लिम की राजनीति के लिए नहीं, बल्कि भारत के नागरिक होने की पहचान है

  • by: news desk
  • 28 October, 2019
दीपक कुमार त्यागी का BLOG: एनआरसी हिंदू-मुस्लिम की राजनीति के लिए नहीं, बल्कि भारत के नागरिक होने की पहचान है

नई दिल्ली: भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) राज्य में ‘विदेशियों’ की पहचान के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बहुत लम्बे समय से चल रही एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत 31 अगस्त दिन शनिवार की सुबह 10 बजे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी (NRC) की तीसरी व फ़ाइनल लिस्ट जारी हो गयी है। इस लिस्ट के अनुसार 19,06,657 आवेदकों के नाम इस में शामिल नहीं हैं। NRC की फ़ाइनल लिस्ट में कुल 3,11,21,004 लोगों को शामिल किया गया है। जबकि इस मसौदे में कुल 3.29 करोड़ आवेदकों ने आवेदन करके स्वयं के भारत का नागरिक होने के दावा किया था।  





राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की इस फ़ाइनल लिस्ट को NRC की अधिकृत वेबसाइट  http://www.nrcassam.nic.in पर देखा जा सकता है। इसके साथ ही इस लिस्ट को 33 जिला उपायुक्त के कार्यालयों पर, 157 क्षेत्राधिकारियों के कार्यालयों पर व 2500 एनआरसी सेवा केंद्रों पर ऑफिस समय में देखा जा सकता हैं।



 



आपको बतादे कि एनआरसी की लिस्ट जारी होने से पूर्व ही केंद्रीय गृहमंत्रालय ने देश के गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में व असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की मोजूदगी में एक उच्चस्तरीय बैठक करके असम के उन लोगों को बड़ी राहत की खबर दे दी थी, जिनका नाम एनआरसी की अंतिम लिस्ट में नहीं आ पाएगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनआरसी को लेकर असम के निवासियों की विभिन्न आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करते हुए कहा था कि एनआरसी की अंतिम सूची में नाम नहीं होने का मतलब स्वत: किसी व्यक्ति का विदेशी नागरिक घोषित हो जाना नहीं है।



 



एनआरसी में नाम शामिल नहीं होने के खिलाफ अपील के पर्याप्त प्रबंध किए गए हैं। मंत्रालय ने कहा था कि वह एनआरसी से बाहर होने वालों के लिए "विदेशी नागरिक न्यायाधिकरण" में अपील दायर करने की समय सीमा 60 दिन से बढ़ाकर 120 करने के लिए नियमों में संशोधन करेगा। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि विदेशी नागरिक कानून 1946 और "विदेशी नागरिक न्यायाधिकरण" के आदेश 1964 के प्रावधानों के तहत "विदेशी नागिरक न्यायाधिकरण" के पास ही किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने का अधिकार है। 'इसलिए एनआरसी से किसी व्यक्ति का नाम छूटने का यह मतलब नहीं है कि उसे स्वत: विदेशी घोषित किया जा रहा है।' जिसका नाम अंतिम लिस्ट में नहीं होगा, वो स्वतः विदेशी घोषित नहीं हो जाएगा, उसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा ।



 



वहीं मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने असम के लोगों को भरोसा दिलाया है कि अंतिम लिस्ट में नाम न होने पर किसी भी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाएगा और उसे अपनी नागरिकता साबित करने का हरसंभव मौका व कानूनी सहयोग दिया जाएगा। जिनका नाम इस अंतिम लिस्ट में नहीं होगा वो इसके लिए बनाए गये फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में अपील कर सकेंगे। सरकार ने अपील दायर करने की समय सीमा भी 60 दिन से बढ़ाकर 120 दिन यानि कि 31 दिसंबर 2019 तक कर दी है।



 



आज भी एनआरसी की फ़ाइनल लिस्ट आने से ठीक पहले असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने लोगों से कहा है कि लिस्ट में नाम नहीं आने की सूरत में वो न घबराएं और शांति बनाए रखें। सोनोवाल ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट में कहा कि "एनआरसी की लिस्ट में नाम नहीं आने वाले लोगों को जरा भी घबराने की ज़रूरत नहीं क्योंकि गृहमंत्रालय ने पहले ही सुनिश्चित कर दिया है जिनका नाम इस लिस्ट में नहीं होगा उनको फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में जाकर अपील करने का अधिकार होगा। इस मामले में सरकार की तरफ से उनकी हरसंभव मदद की जाएगी।" उन्होंने कहा, "फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल में अपील करने का समय अब बढ़ाकर 60 की बजाए 120 दिन कर दिया गया है, ऐसे में सभी लोग शांति और क़ानून व्यवस्था बनाए रखें."





राज्य में सुरक्षा के मद्देनज़र बड़ी संख्या में पुलिसबल व 51 कम्पनी सुरक्षाबलों की तैनात की गयी हैं साथ ही कुछ जगह धारा-144 लागू कर दी गयी हैं। पुलिस-प्रशासन के द्वारा लोगों को सलाह दी जा रही है कि वो किसी भी तरह की फ़ेक न्यूज़ या अफ़वाहों के झांसे में नहीं आये। हालांकि लिस्ट जारी होने के बाद देश एकबार फिर चंद राजनेताओं के द्वारा बेहद कटु हिंदू-मुस्लिम करने वाली राजनैतिक बयानबाजी शुरू हो गयी है जो कि देशहित में उचित नहीं है।



 



वहीं इस मसले को लेकर असम के डीजीपी कुलधर सैकिया ने कहा है कि, "अगर कोई सोशल मीडिया के जरिए फ़ेक न्यूज़, नफ़रत या अफ़वाह फैलाने की कोशिश करता है तो उसे बख़्शा नहीं जाएगा उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जायेगी।''



 



एनआरसी क्या है-:

सरल भाषा में हम एनआरसी को असम में रह रहे भारतीय नागरिकों की पहचान की एक लिस्ट समझ सकते हैं या ये भी समझ सकते है कि एनआरसी की ये प्रक्रिया दरअसल राज्य में अवैध तरीक़े से घुस आए तथाकथित बंगलादेशियों व अन्य विदेशी नागरिकों की पहचान करने की एक कानूनी प्रक्रिया है। सरकार का मानना है कि असम राज्य में ग़ैर क़ानूनी रूप से रह रहे विदेशी लोगों को चिह्नित करने के लिए ये एनआरसी रजिस्टर बहुत ज़रूरी है।



 



एनआरसी को सबसे पहले वर्ष 1951 में बनाया गया था। ताकि ये तय किया जा सके कि कौन असम में पैदा हुआ भारतीय नागरिक है और कौन पड़ोसी बांग्लादेश या अन्य किसी देश से आया हुआ विदेशी नागरिक है। एनआरसी वह रजिस्टर है जिसमें सभी उन भारतीय नागरिकों का विवरण शामिल है। जिसे 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था।



 



रजिस्टर में उस जनगणना के दौरान गणना किये गए सभी व्यक्तियों के विवरण शामिल है। अब इस एनआरसी रजिस्टर को पहली बार सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राज्य में एक बार फिर अपडेट किया जा रहा है। इसमें उन लोगों को भारतीय नागरिक के तौर पर स्वीकार किया जाना है जो ये साबित कर पाएं कि वो 24 मार्च 1971 से पहले से असम राज्य में रह रहे हैं। इस बार एनआरसी के लिए 24 मार्च, 1971 को कट ऑफ तिथि के तौर पर इसलिए स्वीकार किया गया, क्योंकि उसके बाद बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के समय 1971 में पाकिस्तानी सेना के दमन से बचने के लिए भारी तादाद में बांग्लादेश के लोगों ने असम में आकर शरणार्थी के रूप में शरण ली। 



 



 



एनआरसी की लिस्ट का प्रकाशन-:



देश के पूर्वोत्तर राज्य असम में वर्ष 2005 में सरकार ने 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने का फैसला किया और तय किया कि असम समझौते के तहत 25 मार्च, 1971 से पहले असम में अवैध तरीके से प्रवेश करने वाले लोगों का नाम भी एनआरसी में जोड़ा जाएगा। लेकिन इसके बाद हिंदू-मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति के चलते यह विवाद सुलझने की बजाय और अधिक बढ़ता चला गया तथा मामला न्यायालय पहुँच गया। इसके बाद एनआरसी अपडेट करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट (मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच) की देखरेख में वर्ष 2013 में शुरू हुई। बाद में इसके लिए आईएएस अधिकारी प्रतीक हाजेला को इसका समन्वयक बनाया गया, जिनके नेतृत्व में एनआरसी की अब तक सारी लिस्ट तैयार हुयी हैं। जिसमें कुल 3.29 करोड़ लोगों ने अपने नाम भारतीय नागरिक के रूप में शामिल करवाने के लिए आवेदन किया था।



 



एनआरसी की लिस्ट के प्रथम ड्राफ्ट का प्रकाशन 31 दिसंबर, 2017 को किया गया था। उस समय 1.9 करोड़ लोगों के नाम लिस्ट में शामिल नहीं किए गए थे। ऐसे लोगों को फिर से आवेदन करने का समय दिया गया था। उसके बाद दूसरी और अंतिम लिस्ट 30 जुलाई 2018 को प्रकाशित हुई, एनआरसी के इस फ़ाइनल ड्राफ्ट से 40,07,707 लोगों को बाहर कर दिया गया था। बाहर निकाले गए इन लोगों के लिए आख़िरी और एकमात्र उम्मीद थी एनआरसी की दावा-आपत्ति प्रक्रिया। हालांकि, ये प्रक्रिया आयोजित करने के लिए स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का जो मानक रूप 16 अगस्त 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया था उस पर भी अलग-अलग राय हैं। लेकिन अंत में लिस्ट से बाहर रह गये लोगों को अपनी 'लेगेसी' और 'लिंकेज' को साबित करने वाले काग़ज़ समयानुसार एनआरसी के दफ्तर में जमा करने को कहा गया थे।



 



इन काग़ज़ों में 1951 की एनआरसी में आया उनका या उनके पुर्वजों के नाम, 1971 तक की वोटिंग लिस्ट में आए नाम, ज़मीन के काग़ज़, स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के सबूत, जन्म प्रमाण पत्र और माता-पिता के वोटर कार्ड, राशन कार्ड, एलआईसी पॉलिसी, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, रेफ़्यूजी रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट जैसी चीज़ें शामिल थी। फिर 26 जून, 2019 को एक अतिरिक्त सूची का प्रकाशन कर ड्राफ्ट एनआरसी में शामिल हो चुके लोगों में से भी लगभग एक लाख लोगों के नाम काट दिए गए थे। अब 41 लाख लोगों में से 36 लाख लोगों ने नए सिरे से दस्तावेज देकर अपने नाम को सूची में शामिल करने का दावा किया है। उस फ़ाइनल एनआरसी लिस्ट का 31 अगस्त, 2019 को प्रकाशन किया गया है। जिसके बाद से देश में राजनैतिक पारा जबरदस्त रूप से बढ़ गया हैं।



 



अंतिम एनआरसी लिस्ट में नाम नहीं आने से क्या होगा? -: नियमानुसार

जिन लोगों के नाम अंतिम लिस्ट में शामिल नहीं हैं, उन्हें इसके बाद बनाये गये 400 फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल या एफटी के सामने काग़ज़ों के साथ पेश होना होगा, जिसके लिए उन्हें सरकार ने 120 दिन 31 दिसंबर 2019 तक का समय दिया है। किसी भी व्यक्ति के भारतीय नागरिक होने या न होने का निर्णय ये 400 फ़ॉरेन ट्राइब्यूनल ही करेगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इस निर्णय के बाद भी व्यक्ति के असंतुष्ट होने पर उसके पास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने का कानूनी विकल्प मौजूद है।



 



विदेशी नागरिक घोषित होने पर पर क्या होगा-: एनआरसी के संदर्भ में "विदेशी नागिरक न्यायाधिकरण" (फ़ॉरेन ट्राइब्यूनल) के द्वारा किसी व्यक्ति को अगर विदेशी घोषित कर दिया जाता है, तो इस पर फ़िलहाल भारत सरकार की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं दिया गया है। लेकिन पूर्व के कानून के हिसाब से उन्हें हिरासत में रखने से लेकर देश से निर्वासित करने तक के प्रावधान मौजूद है।



 



 असम में एनआरसी की आवश्यकता क्यों पड़ी-: वर्ष 1947 में जब भारत-पाक का बँटवारा हुआ था तो कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन उन लोगों की ज़मीन असम में थी। इस तरह के लोगों का दोनों ओर से आना-जाना देश के बँटवारे के बाद भी जारी था। जिसके चलते भारत सरकार ने वर्ष 1951 में "राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर" (एनआरसी) तैयार किया था।





लेकिन वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी असम में भारी संख्या में शरणार्थियों का आना जारी रहा जिसके चलते राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। जिसके बाद वर्ष 1980 के में "अखिल असम छात्र संघ" (All Assam Students Union-AASU) ने अवैध तरीके से घुसपैठ करके असम में रहने वाले लोगों की पहचान करने तथा उन्हें वापस भेजने के लिये एक बहुत बड़े जनआंदोलन को शुरू किया था। AASU के छह साल के लम्बे संघर्ष के बाद 15 अगस्त, 1985 को AASU और दूसरे संगठनों तथा भारत सरकार के बीच में एक समझौता हुआ था, जिसे "असम समझौते" के नाम से जाना जाता है। इसी समझौते की एक शर्त के अनुसार, 25 मार्च, 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाले घुसपैठियों की पहचान की जानी थी तथा उन्हें राज्य से बाहर किया जाना था।  



 



नागरिकता की समाप्ति से उत्पन्न होने वाली समस्याएँ-: एनआरसी की अंतिम सूची जारी होने के बाद असम में 19 लाख लोग स्टेटलेस हो गए हैं, अर्थात् वे किसी भी देश के नागरिक नहीं रहे। ऐसी स्थिति के चलते राज्य में कानून व्यवस्था चरमराने का खतरा हर पल बना हुआ है। जो घुसपैठिए लोग दशकों से असम में रह रहे थे, उनकी भारतीय नागरिकता समाप्त होने के बाद वे न तो पहले की तरह अब भविष्य में वोट दे सकेंगे, जिसके चलते भविष्य में उनका पूर्ण रूप से राजनैतिक वजूद खत्म हो जायेगा और  आने वाले समय में उनको केंद्र व राज्य सरकार की किसी भी कल्याणकारी योजना का लाभ भी नहीं मिलेगा। साथ जिन लोगों के पास अचल सम्पत्ति है भविष्य में अपनी ही संपत्ति पर इनका कोई अधिकार नहीं रहेगा। 



 



निष्कर्ष-: एनआरसी की अंतिम लिस्ट आने बाद सरकार के लिये स्थिति बहुत सोच-समझकर निर्णय करने वाली होगी। क्योंकि नागरिकता के इस मामले ने असम ही नहीं बल्कि पूरे भारत में एक नयी बहस छेड़ दी है अलग-अलग राज्यों के द्वारा अपने यहाँ इस एनआरसी की प्रक्रिया करवाने की मांग अब उठने लगी है। देश की राजनीति पर नज़र डाले तो पूर्व में हिंदू-मुस्लिम करके देश के कुछ राजनैतिक दलों ने एनआरसी के मसले को लेकर असम के साथ-साथ देश के अलग-अलग भागों में जमकर राजनीति की है।



 



जिस तरह से अपनी क्षणिक ओछी राजनीति के लिए इस बेहद ज्वंलत मुद्दे को देश के चंद नेताओं ने वर्षों तक लटकाए रखा है वह देश के नीतिनिर्माताओं के साथ-साथ सभी समझदार देशवासियों के लिए सोचनीय है। लेकिन अब सभी देशवासियों को आवश्यकता है कि वो इस मामले की गंभीरता को समझे और कानून को सुचारू रूप से अपना काम करने दे। किसी तरह की अफवाह ना फैलाया और जिम्मेदार देशभक्त नागरिक की तरह अपनी देश के प्रति जिम्मेदारी समझने का प्रयास करें। साथ ही यह भी समझे कि  "एनआरसी हिंदू-मुस्लिम करके देश में राजनीति करने के लिए नहीं है, बल्कि भारत के नागरिक होने की पहचान है"। इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि कुछ गैरजिम्मेदार नेताओं व लोगों के उकसाने वाली बातों पर ध्यान ना देकर देश व सभ्य समाज के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करें।।



 



 


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