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जन्म दिन विशेष: आख़िर कौन थे बिहार लेनिन अमर शहीद बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा ?

  • by: news desk
  • 02 February, 2020
जन्म दिन विशेष: आख़िर कौन थे बिहार लेनिन अमर शहीद बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा ?

बिहार भारत में सदियों से चली आ रही शोषणवादी व्यवस्था के खिलाफ क्रांति की भूमि रही है बिहार ने ही उत्तर भारत में सामाजिक न्याय की लड़ाई को मजबूत किया है और गैर बराबरी व्यस्था को दूर करने के लिए हरदम आवाज को बुलंद किया है , बुद्ध की वैचारिकी हो , या चन्द्र गुप्त मौर्य और अशोक का शासन , कर्पूरी की नीति हो या जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति का उदघोष , बाबू जगदेव प्रसाद का आडंबरी व्यवस्था के खिलाफ ललकार हो या बीपी मंडल की संवैधानिक नीति वाद , लालू की अडिगता हो या सूरज मंडल और रतनलाल का वर्तमान में कर रहे बौद्धिक   संघर्ष  । हमेशा बिहार ने जातिवाद , वर्णवाद , पूजीवाद , व्यवस्था का खुल कर प्रतिकार किया है , समाज में सामाजिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक शोषण से मुक्ति के प्रयास हो या सामंतवाद का  विरोध , हर सामाजिक मुद्दे पर बिहार मजबूत आवाज बना है ।  ऐसे ही क्रांति के अमर आवाज थे बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा । जो सामाजिक आंदोलन के नायक थे जिनके विचार से सामंतवादी , पूजीवादी , जातिवादी मानसिकता के लोग घबरा गए थे   , उनका नारा था

"सौ में नब्बे शोषित है शोषितों ने ललकारा है

धन धरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है "

दस का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा नहीं चलेगा "


ऐसे क्रांतिकारी  विचार के मसीहा

बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा का जन्म 2 फरवरी, 1922  को जहानाबाद जिले के कुर्था ब्लॉक के कुलहारी गांव में हुआ था इनके पिता का नाम प्रज्ञा नारायण और माता का नाम रसकली  था वह अपने माता पिता के चौथे संतान थे  पिता पेशे से शिक्षक और माता गृहणी थी घर में मात्र साढ़े तीन बीघा  जमीन था ,  उन्होंने प्राथमिक शिक्षा पिता के ही मार्गदर्शन  में प्राप्त किया ,  स्नातक शिक्षा जहानाबाद  से 1948 में पास किया  , परास्नातक पटना कालेज से 1950 में  अर्थशास्त्र विषय से प्राप्त किया । उनकी शादी  सतरंजना देवी से हुआ उनके तीन बेटे और दो बेटियां हुई बेटो का नाम प्रताप सेनापति , नागमणि और जयदीप प्रताप तथा बेटियों का नाम शैल कुमारी और मधु कुमारी था । लेकिन बाबू जगदेव प्रसाद वैचारिक रूप से मात्र अपने पुत्रों के संरक्षक नहीं थे उन लाखों वंचित समाज के संरक्षक थे जो आज उनके विचारों की आवाज बुलंद कर रहे हैं , सड़कों पर सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं, उस किसान के पिता है जो फसल के उचित मूल्य और बराबरी के जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है , उस विद्यार्थी के पिता है जो शैक्षिक असमानता के शिकार हैं ,  उस मजदूर के पिता है जो पूजीवादियों के शोषण के शिकार हैं उन शोषित समाज के पिता है जो आज भी जातिवाद ,वर्णवाद, छुआ छूत और धार्मिक कर्मकांड के शिकार हैं  ।

उत्तर भारत में ‘शोषितों की आवाज  ,  सामाजिक क्रांति के जनक, और साहित्य के प्रबल समर्थक ,  शोषित समाज के महान नायक भारतीय लेनिन बाबू जगदेव प्रसाद एक ऐसी सामाजिक नीव डाल गये हैं, कि आज भी उसी नीति और सिद्धांत पर शोषित समाज अग्रसर है।


बाबू जगदेव प्रसाद  शुरू से ही विद्रोही विचार के थे , उन्होंने  पंचकठिया प्रथा का खुल कर विरोध किया ।

बाबू जगदेव प्रसाद जी  पिता के मृत्यु के पश्चात ही सारे देवी देवता , पूजा पाठ , और अन्य धार्मिक कर्मकांड को त्याग दिया और मानवतावादी विचार के समर्थक बने ।


बाबू जगदेव प्रसाद जी का परिचय चंद्रदेव प्रसाद वर्मा से हुआ, चंद्रदेव वर्मा ने जगदेव बाबू को विभिन्न मानवतावादी विचारको को पढने, जानने-सुनने के लिए प्रेरित किया, अब जगदेव बाबू ने सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया और राजनीति की तरफ प्रेरित हुए।  और ‘सोशलिस्ट पार्टी’ से जुड़ गए उन्होंने राजनीतिक जीवन के साथ साथ पार्टी के  पत्र ‘जनता’ का संपादन का कार्य भी किया किया। आप  लेखन शोषित समाज की समस्याओं को समर्पित होती थी आप उदय और सिटीजन अंग्रेजी पत्रिका के संपादक  का कार्य भी किए   आप का मानना था कि लड़ाई जीतने में दोस्त और दुश्मन की पहचान जरूरी है और जाति व्यवस्था कायम रखकर शोषित समाज के साथ न्याय नहीं कर सकते  

उनके वैचारिक आंदोलन तथा सामाजिक विचारों से जनता आंदोलित होने लगी उनमें विचार का संचार होने लगा ।

प्रकाशक से  कुछ वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद होने के कारण त्याग पत्र दे दिया।

आप सामाजिक न्याय के पक्षधर थे उस समय एक नारा गुज़ रहा था " सासोपा ने बाधी गाठ पिछड़े पावे सौ में साथ " बाबू जी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से  कुर्था विधान सभा से चुनाव लडे और जीते भी ,  कर्पूरी ठाकुर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायक दल के नेता तथा बाबू जगदेव प्रसाद जी उपनेता चुने गए । ससोपा के 68 विधायक चुने गए , दूसरी सोशलिस्ट पार्टी प्रसोपा के 17 विधायक और जन क्रांति पार्टी के 28 विधायक चुने गए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी जन क्रांति पार्टी के विधायक दल के नेता कामाख्या नारायण सिंह और उप नेता महा माया प्रसाद सिन्हा थे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री बनना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ समाजवाद में भी सवर्ण वाद रंग दिखा दिया अंदर खाने तय हुआ कि कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री न बनने पाए  सासोपा के 68 विधायक होने के बाबजूद कर्पूरी मुख्यमंत्री नही बन सके  और तर्क दिया गया कि मुख्यमंत्री को हराने वाला मुख्यमंत्री बनेगा कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री रहे केबी सहाय दो सीट हजारीबाग और पटना शहरी क्षेत्र से चुनाव लडे थे और दोनों सीट पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा था , हजारी बाग से जन क्रांति पार्टी के पिछड़े वर्ग के नेता रघुनंदन प्रसाद तथा पटना शहरी क्षेत्र से जन क्रांति पार्टी के ही महा माया प्रसाद सिन्हा विजय प्राप्त किए थे , लेकिन राजनीतिज्ञो के चाल और जातीय खेल में महामाया प्रसाद सिन्हा छोटे पार्टी का उप नेता होने के बावजूद मुख्यमंत्री बने , जबकि मुख्यमंत्री को हजारी बाग से हराने वाले रघुनंदन को मंत्री तक नही बनाया गया , कुछ दिनो बाद बाबू जगदेव प्रसाद चालाकी को समझ रहे थे और वह अलग हो गए । मतलब साफ है बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा जी विचार में समझौता नहीं करते थे।


उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी को मजबूत करने के लिए बड़े बदलाव किए, नीतियां आसानी से समझ में आए इसलिए सांस्कृतिक परिवेश बना कर लोगों की समझाने का प्रयास किया   और समाजवादी विचारधारा को आसानी से घर-घर पहुंचा दिया।


जगदेव प्रसाद कुशवाह तथा कर्पूरी ठाकुर की सूझ-बूझ से ही पहली गैर-कांग्रेस सरकार का गठन हुआ, लेकिन पार्टी की नीतियों तथा विचारधारा के मसले पर लोहिया से अनबन हुई  क्यों थी उनका कहना था कि "ऊची  जातियों के लोगों ने हमारे बाप दादाओं से हलवाही करवाई  है लेकिन मै उनकी राजनीतिक हालवाही करने के लिए पैदा नहीं हुआ हूं "  जिससे मतभेद होने के कारण  इन्होंने छोड़ दिया ।

25 अगस्त 1967 को ‘शोषित दल’ नाम से नयी पार्टी का गठन किया  ।

बिहार में राजनीति को सुलभ बनाने के लिए उन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक और  क्रांति की आवश्यकता महसूस की। वे मानववादी रामस्वरूप वर्मा द्वारा स्थापित ‘अर्जक संघ’ (स्थापना 1 जून, 1968) में शामिल हुए।  वह सांस्कृतिक परिवर्तन को सामाजिक स्थापना की मजबूत कड़ी मानते थे  


7 अगस्त 1972 को शोषित दल तथा रामस्वरूप वर्मा की पार्टी ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ और ‘शोषित समाज दल’ नामक नयी पार्टी का गठन किया गया। जिसके अध्यक्ष राम स्वरूप वर्मा , महामंत्री बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा और संगठन मंत्री रामाचार्य यादव बने पार्टी का सिद्धांत था " शोषितो का राज शोषितो के द्वारा शोषितो के लिए"

एक दार्शनिक तथा एक क्रांतिकारी के संगम से पार्टी में नयी उर्जा का संचार हुआ।  वे नए-नए तथा जनवादी नारे गढ़ने में निपुण थे। सभाओं में जगदेव बाबू के भाषण बहुत ही प्रभावशाली होते थे,

25 अगस्त 1967 को उन्होंने बहुत ही शानदार भाषण दिए थे


"जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।”



जगदेव बाबू ने अपने भाषणों से शोषित समाज में नवचेतना का संचार किया, उनका मानना था कि चेतना से ही स्वतंत्रता का उदय होता है, स्वतंत्रता मिलने पर अधिकार की मांग उठती है और राज्य को मजबूर किया जाता है कि वे उचित अधिकारों को प्रदान करे। जगदेव प्रसाद ने सामाजिक न्याय को परिभाषित करते हुए कहा था कि ‘दस प्रतिशत शोषकों के जुल्म से छुटकारा दिलाकर नब्बे प्रतिशत शोषितों को नौकरशाही और जमीनी दौलत पर अधिकार दिलाना ही सामाजिक न्याय है।’

बिहार की जनता अब इन्हें ‘बिहार के लेनिन’  के नाम से बुलाने लगी।


जिससे 5 सितम्बर 1974 से राज्य-व्यापी सत्याग्रह शुरू करने की योजना बनी। 5 सितम्बर 1974 को जगदेव बाबू हजारों की संख्या में शोषित समाज का नेतृत्व करते हुए अपने दल का काला झंडा लेकर आगे बढ़ने लगे। कुर्था में तैनात पुलिस. ने सत्याग्रहियों को रोका तो जगदेव बाबू ने इसका प्रतिवाद किया और विरोधियों के पूर्वनियोजित जाल में फंस गए। जबकि बाबू जी को उनके कुछ शुभ चिंतकों ने आगाह किया था लेकिन सत्याग्रह के लिए अडिग रहे , सत्याग्रह के दौरान ही  पुलिस ने सत्याग्रहियों के ऊपर गोली चला दी। गोली सीधे उनके गर्दन तथा लक्ष्मण पासवान को  जा लगी, वे दोनों लोग गिर पड़े। सत्याग्रहियों ने उनका बचाव किया, किन्तु क्रूर पुलिस घायलावस्था में उन्हें पुलिस स्टेशन ले गयी। इस सत्याग्रह में 12  वर्षीय लक्ष्मण पासवान और बाबू जगदेव प्रसाद पुलिस द्वारा हत्या के शिकार हुए, पुलिस प्रशासन ने उनके मृत शरीर को गायब करना चाहा,  लेकिन भारी जन-दबाव के चलते उनके शव को 6 सितम्बर को पटना लाया गया,

आज वही अमर शहीद सामाजिक राजनीतिक   और सांस्कृतिक क्रांति के  जननेता शोषितों के आवाज  बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा जी का जन्म दिन है जन्म दिन के अवसर पर सादर नमन ,

जब जब इतिहास में जनक्रांति आंदोलन की आवाज उठेगी बाबू जी के विचार और त्याग हमे बल प्रदान करेंगे और जनक्रांति को प्रोत्साहित करेंगे।



पवन  मौर्य - अखिल भारतीय पिछड़ा समाज महासंघ उत्तर प्रदेश







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